Friday, April 28, 2006

तीन कविताएँ

प्रश्न चिन्हों की कतारों सी समस्याएँ खड़ी।


कह रही हैं-आज तक क्या हम सभी करते रहे।।
भूख-बीमारी-गरीबी देश में बढ़ती रही।
स्वार्थ प्रेरित जलद बन हम सिन्धु पर झरते रहे।।
स्वार्थ-सर्पिणि देश की खुशहालियाँ डसती रही।
हम कुशलतम संपेरे का ढोंग भर भरते रहे।।
धर्म-भाषा-क्षेत्र की नित खाइयाँ बढ़ती गयीं।
पाटने से किन्तु सत्ता मोह में बचते रहे।।
प्रश्नपत्रों सी समस्यायें विरासत में मिलीं।
हम परीक्षाकाल में बस हाँशिये रँगते रहे।।
पुल बने, चिमनी बनीं, सड़कें बनीं पर साथ ही।
हम विदेशी कर्ज की चक्की तले दलते रहे।।
सदा सीमायें हमारी शत्रुदल छलना रहा।
हम कबूतर शान्ति के बन विश्व में उड़ते रहे।।
प्रगति होती राष्ट्र की क्या खाक, जब सब रहनुमा।
चुनावों की परिधि पर ही चक्रवत चलते रहे।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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हिन्दी बाहर लाओ


गूँज रही है धरा-गगन में
जिसकी गौरव-गाथा।
कोटि-कोटि कंठों का कलरव
जिसकी महिमा गाता।।
लहर-लहर लहाराये नभ में
जिसकी सुयश पताका।
युग-युग से विद्वद-जन जिसके
पग पग पर शीश झुकाता।।
वह जननी, यह लोक-भारती
शारद की प्रतिमा-सी।
लोक-वंदिता भारत माँ के
यश की शुभ गरिमा-सी।।
वह हिन्दी वह राष्ट्रवाणी
निखिल विश्व में गूँजे।
जग उपवन में प्रवास की
काली-कोकिल सी कूजे।।
आजादी के महासमर का
शंख बजाने वाली।
स्वतन्त्रता की स्वाभिमान की
ज्योति जलाने वाली।।
भारत की सब भाषाओं का
सिंचन करने वाली।
हिन्दी है भारतमाता के
मुख-मण्डल की लाली।।
अगणित लेखक-कवि-सम्पादक
इसने जग में जाये।
युग-युग से इसकी पूजा में
हमने दीप जलाये।।
वह हिन्दी वह मातृभाषा
विश्व गगन में चमके।
उसके सुरभित सुमनों से
अग-जग का आँगन महके।
उसके सुरभित सुमनों से
अग-जग का आँगन महके।।
देशभक्ति का राष्ट्र-प्रेम का
दावा करने वालों !
अंग्रेजी के पक्षपात की
हमी भरने वालों !
औरों की माता के ऊपर
अपनी माँ मत वारो।
तन-मन-धन-जन करो समर्पित
माँ का मुकुट सँवारो।।
स्वार्थ-सिद्धि के गलियारों से
हिन्दी बाहर लाओ।
भारत-माँ के उच्च भाल की
बिन्दी को चमकाओ।।
अंग्रेजी के पक्षपात का
दूषित चिन्तन छोड़ो।
हिन्दी की पावन यश-धारा
प्रगति-पंथ पर मोड़ो।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र


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आज आने दो नयी कोंपल वहाँ


जरा-जर्जर अस्थि-पञ्जर-गात!
ऐ पके पीले पुराने पात!
पेड़ की इस शाख पर
कब तक रहोगे?
लोभ-लिप्सा की उफनती बाढ़ में
कब तक बहोगे?
मृदा का शोषण बहुत
तुम कर चुके हो!
रक्त मधु ऋतु का बहुत
तुम पी चुके हो!
हो चुका फिर भी तुम्हारी
शक्ति का अवसान;
जोहता है अब तुम्हारी
बाट ये शमशान।
अत: कर दो रिक्त वह स्थान
मोहवश जिसको लिया है
निजी सम्प्रति मान।
लोभ का अब और मत
पोषण करो;
किसलयों का अब न यों
शौषण करो;
कुण्डली सी काढ़ तुम
बैठ जहाँ,
आज आने दो नयी
कोंपल वहाँ।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
-०००-





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ओ भरत भद्र

अब काँप रहे हैं धरा-व्योम-रवि-शशि-तारे
झंझा में कँपती दीप शिखा सी मानवता।
क्षण-क्षण शोषण के रावण करते अट्टहास
स्वारथ-रथ पर चढ़ दिशि-दिशि फिरती दानवता।।
सत्ता का लालच रचता नित षड़यंत्र नये
मंथरा कुटिलता नयी-नयी चालें चलती।
मोहान्ध स्वार्थपरता कैकयी-सी छलना
दशरथ से सत को यन्त्र-तत्र छलती फिरती।।
सद्नीति कौशिला सी रोती है फूट-फूट
सद्क्रिया सुमित्रा खड़ी हुई निस्र्पाय आज।
गुस्र्वार वशिष्ठ से प्रज्ञाजीवी मौन खड़े
हो दिशाहीन असहाय रो रहा जन-समज।।
पद के अनुरूप योग्यताधारी प्रतिभायें
पा रहीं निरन्तर हैं शासन से निर्वासन।
वनवास भोगते आदर्शों के राम आज
है कर्मवीर लक्ष्मण बिनु सूना राजभवन।।
सद्भावों के मंजुल मयंक! ओ भरत भद्र!
संत्रस्त आयोध्या बाट तुम्हारी जोह रही।
ओ भ्रातृभक्ति-प्रतिमूर्ति ! तपी ! ज्ञानी ! उदार !
शोषित-पीड़ित मानवता तुमको टेर रही।।
आओ! आकर बदलो युग के रथ की गति को
शोकुकाल विह्बल जन-मन को फिर धीरज दो।
लालच की अंधी गलियों में भटके युग को
वैराग्य-दीप-आलोक दिखा निर्देशन दो।।
वैधव्य भोगतीं जिसके कारण मातायें
जिस कारण सीता सुकुमारी फिरती वन-वन।
उस पिशाचिनी सत्ता की लिप्सा ज्वाला का
है धर्मवीर! नन्दी कानन में करो शमन।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
***

सौगन्ध

सौगन्ध तुम्हें ऐ तस्र्णाई ! उन पुरखों की
जो अंगारों पर चलकर आजादी लाये।
हँस-हँस कर झूले जो फाँसी के फन्दों पर
जो प्रलय-घटा बनकर अरि-सर पर घहराये।।
सौगन्ध तुम्हें ऐ तस्र्णाई ! उन वीरों की
जो क्रान्ति-यज्ञ में समिधा बनकर सतत जले।
बैलों के बदले जुते कहीं जो कोल्हू में
जो बलिदानों की खड्गधार पर विहँस चले।।
सौगन्ध तुम्हें ऐ तस्र्णाई ! उन सिंहों की
जिनके गर्जन से भीत-शुत्र घर को भागा।
सौगन्ध तुम्हें आजाद-हिन्द के जय-स्वर की
जिसको सुनकर सोये स्वदेश का बल जागा।।
सौगन्ध तुम्हें उस बचपन की जो खोज रहा
कूड़े-कचरे के ढेरों पर अपनी रोटी
सौगन्ध तुम्हें उस यौवन की जो भटक रहा
दफ्तर-दफ्तर कहता फिरता किस्मत खोटी।।
सौगन्ध तुम्हें उन अधरों की जिनकी सुस्मिति
नित जकड़ रहीं आतंकवाद की हथकड़ियाँ।
सौगन्ध तुम्हें निर्वासित कश्मीरी जन की
जो आजादी पर वार रहे दृग-जल-लड़ियाँ।।
सौगन्ध तुम्हें ललनाओं के उस यौवन की
जिसको झिंझोड़ती जहाँ-तहाँ नर की पशुता।
सौगन्ध तुम्हें राखी के पावन धागों की
छलती-फिरती जिसको पग-पग पर दानवता।।
सौगन्ध तुम्हें ऐ ! तस्र्णाई मत मौन रहो,
चुपचाप न देखो दृश्य और बरबादी का।
उत्साह-कर्म निस्वार्थ-त्याग बल-प्रभा-पुञ्ज!
यों दुस्र्पयोग मत होने दो आजादी का।।
अब और सहो मत तन-मन पर आघातों को
अब और न होने दो हत-आहत स्वाभिमान।
अब और न ढोओ वैभव बेईमानों का
अब और न खोओ आजादी की आन-बान।।
विश्वासों में विष और न तुम घुलने दो
जन के सपने शासन को और न छलनेे दो।
स्वाधीन-राष्ट्र-मंदिर के पावन-आँगन में
षडयंत्रों के काले-कुचक्र मत फलने दो।।
तुम पढ़ो मंत्र अब फिर से युग-परिवर्तन के
भोगों की भू पर त्याग-बीज फिर से बोओ।
जड़ता छोड़ो ! हुंकार उठो ! ललकार भरो
भ्रष्टाचारी के तिमिर-मध्य यूँ मत सोओ।।
डँस रहे स्वप्न जो नये सृजन के पग-पग पर
उन काले नागों पर मयूर बनकर झपटो।
सौगन्ध तुम्हें प्यारे स्वदेश के युग-प्रहरी
तस्र्णों ! जागो ! जनहित के चारों को डपटो।।
तुम तपो दिवाकर बन अम्बर की छाती पर
धरती का तम-हर ज्योति रश्मियाँ बिखराओ।
अस्तित्व वाष्पित कर भू-तल से ऊपर उठ
तपते जन-मन पर शीतल घन बन छा जाओ।।
जनता के उर के स्नेह बिन्दु सब संचित कर
तुम जलो दीप की बाती बन अविराम यहाँ।
बन शूल करो रक्षा उपवन के फूलों की
जिससे उनका सौरभ बिखरे अब जहाँ-तहाँ।।

-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
***

कैसे मान लूँ मैं

जिन्दगी मोहताज हो जब
मौत के रहमो करम की,
मिल गयी स्वातन्ञ्य की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
पाँव में जब बेड़ियाँ अज्ञान की हों
और भय की रस्सियों से कर बँधे हों;
मस्तकों में हो अँधेरे रूढ़ियों के
तथा ऋण के बोझ से कन्धे दबे हो;
डिगरियाँ लेकर सड़क पर
भटकती हो जब जवानी;
हो उदर में भूख, उर में हूक,
पीड़ा की कहानी;
निबल-कन्धों पर धरे अरमान के शव,
श्लथ-गति से बढ़ रही
असहाय सी, शमशान-पथ पर
नित निरन्तर भीड़ जो,
उस भीड़ को, उद्घोष सुन,
बारात कैसे मान लूँ मैं?
बुद्धिजीवी वर्ग जब निश्चेत हो
और चिन्तन रोग-शैय्या पर पड़ा हो;
बाड़ खेती को जहाँ पर खा रही हो,
वैद्य रोगी को जहाँ विष दे रहा हो;
न्याय देवी के नयन-द्वय
कृष्ण वर्णी पट्टिका से हो बँधे;
और सिक्कों की खनक में
हो सभी पण्डे सधे;
कट सकेंगे पाप के तब हाथ
कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्र्य की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
जब सुधा प्रहरी सुधाकर
सोम का कलशा चुराकर
पश्चिमी क्षिति ओर उन्मुख भागता हो;
किन्तु स्वास्थ के सघन
काले कुहासे की तहों में
रश्मियों का पुञ्ज दिनकर लापता हो;
वायु बन्दी बन गयी हो
जब कुबेरों के भवन में
और घुटती श्वाँस का स्वर हाँफता हो;
शुष्क सिकता पर चटखती
धूप में तब,
खिल सकेगा गात का जलजात
कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्रय की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
बेधते हो व्याघ-शर जब बुलबुलों को,
बेतहाशा चूस लें भौरे गुलों को;
जब चटखती शोख कलियाँ
खिल न पायें,
और श्यामल पात तृण पर
हिल न पायें;
जब पवन के पंख सौरभ हीन होवें,
जब पिकों के कंठ पर ताले जड़े हो,
तुम कहो, कहते रहो
`आया बसन्त'
किन्तु पतझर की बहकती बात
पीले पात लखकर
आ गया रितुनाथ कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्र्य की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
तप रहा जब व्योम में मार्तण्ड हो
ताप उसका प्रबल-प्रखर-प्रचण्ड हो;
और किरणों के दहकते वाण जब
बेधते हों नित निरन्तर उर धरा का;
सलिल वाही स्रोत सारे सूखते हों।
सूखता हो हरित आँचल उर्वरा का
चटखता हो जब हृदय
विश्वम्भरा का;
तब गगन के शुष्क-नीरस बादलों को देख
आ गयी बरसात कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्र्य की
सौगत कैसे मान लूँ मैं?

-डॉ.कृष्ण गोपाल मिश्र
***

स्वप्न

एक निशा की नीरवता में
जब जगती सारी सोती थी।
नभ-मण्डल पर चुपके-चुपके
तारों की मीटिंग होती थी।।
मैं भी अपनी छत पर सुख से
कोमल शैय्या पर सोया था।
वाह्य जगत से बेसुध होकर
स्वर्णिम सपनों में खोया था।
मैंने देखा मैं वन-पथ पर
धीरे-धीरे टहल रहा हूँ।
वन-जीवन के परिवर्तन को
घूम-घूम कर निरख रहा हँ।
उस जंगल के सभी निवासी
बदले-बदले से दिखते थे।
उनके रँग-ढँग कामकाज भी
बडे अनोखे से लगते थे।।
मैंने देखा-छोटा कीड़ा
निर्भय होकर घूम रहा था।
और उछलता मेढ़क उसको
बडे प्यार से देख रहा था।
कुछ आगे बढ़कर देखा तो
मोर सर्प से खेल रहा था।
सर्प कुण्डली मारे बैठा
नाच मोर का देख रहा था।।
एक भेड़िये ने फिर आकर
बकरे को माला पहनायी।
उसको सिर पर हाथ फेरकर
`निर्भय हो' आशीष सुनायी।।
वृद्ध बैल की झील किनारे
एक सिंह से भेंट जे गयी।
सिंह देखकर बेचारे की
सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी।।
किन्तु आज मृगराज बडे ही
बदले-बदले से दिखते थे।
नख कटवाये, दाँत छिपाये
भोले बकरे से लगते थे।।
आगे बढ़कर मृगअधिपति ने
वृद्ध बैल को शीश नवाया।
बडे प्रेम से हाथ पकड़कर
उसकी कुटिया तक पहूँचाया।।
बिल्ली के घर पर पशुओं के
प्रीति-भोज का आयोजन था।
उस दावत में खास तौर पर
चूहों-चिड़ियों का न्यौता था।।
बडे चाव से बिल्ली मौसी
सबको भोजन करा रही थी।
सदा झपटने वाली जालिम
खीर पूड़ियाँ परस रही थी।।
चमत्कार पर चमत्कार का
दर्शन कर मैं बड़ा चकित था।
हिंसक पशुओं में कस्र्णा का
बेग बड़ा आश्चर्यजनक था।।
मैंने सोचा पता लगाऊँ
आखिर ये परिवर्तन क्यों है?
जंगल के जालिम पशुओं में
आज दया का नाटक क्यों है?
एक लोमड़ी ने धीमे से
डरते-डरते मुझे बताया
बदले मौसम की यह माया
अब चुनाव का मौसम आया।
ये सारे ताकतवर हिंसक
अब चुनाव लड़ने वाले हैं।
बाहर से बदले-बदले हैं
अन्दर से पहले वाले हें।।

-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
***

नर प्रवीर सुभाष

प्रबल पौस्र्ष पुंज केहरि !
धीर ! वीर ! सुभाष !
ओ हिमालय के शिखर सम
सुदृढ़ उन्नत भाल !
ओ धरा की धीरता से
भारती के लाल !
दासता हेमन्त -ऋतु के
शुभ सुखद-दिनमान !
पद-दलित परतंत्र-भारत
राष्ट्र के अभिमान !
चेतना की ज्योति के
आलोक-प्रद शुभ-हास।।
देश के गौरव हमारे
सुयश के शुभ-केतु,
दलित जन के उन्नयन हित
क्रांति के शिव-केतु;
राष्ट्र के गौरव तुम्हारा
मुक्ति का अभियान,
है करोड़ों भारतीयों के
सिरों का मान;
थी तुम्हारे कर्मपथ में
छिपी सुख अभिलाष ।।
सिंह सा गर्जन तुम्हारा
दासता तम चीर,
रहा करता दीर्घयुग तक
शुत्र हृदय अधीर;
थी बसी उर में तुम्हारे
देश जन की पीर;
`काट डालूँ दास्य-बंधन
तोड़ दूँ जंजीर'
था यही संकल्प केवल
थी यही शुभ-आशा ।।
नीति मेरी ही सही है
यह दुराग्रह ठान,
ध्वस्त होते देख अपने
अहं का अभिमान;
किया जब सहकमिर्यों ने
उपस्थित गतिरोध,
तब बढ़े नूतन-दिशा में
क्रांति का पथ शोध;
रोक कब पाया प्रभंजन
गति सघन आकाश ?
हैं नियंता की नियति के
अति निराले खेल;
देशभक्तों ने किया फिर
देश-रिपु से मेल;
सत्प्रयासों पर तुम्हारे
दिया पानी फेर
विजय का शुभ चंद्र डाला
राहु ने फिर घेर
हाय् ! हत-आहत हुये तुम
पुज न पायी आश !
धीर ! वीर ! सुभाष !!
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
***

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कालिया

दादी और नानी से सुना है
पुस्तकों में पढ़ा है
और चित्रों में बार-बार देखा है
कि द्वापर में
एक नाग था
विकट विकराल भीमकाय
त्रस्त था उसके त्रास से जीवन-समुदाय।
एक सहस्त्र फन थे उसके
काँपते थे लोग नाम से जिसके;
कालिया नाम था,
यमुना का श्यामल शीतल-जल धाम था।
अचूक था उसके विष का प्रभाव
सम्पर्क में आते ही प्राणों का अभाव।
कितना समदर्शी था वह !
गोपी-ग्वाल-बाल-धेनु
जो भी सम्पर्क में आता
जीवित बचकर न जा पाता ।
आज के युग में भी कालिया विद्यमान है।
तभी तो हरा-भरा उपवन वीरान है।
युग के अनुरूप
बदल गया है उसका स्वरूप
तब था सर्प की देह में,
अब है मनुज रूप में, प्रत्येक गेह में।
समाज की यमुना
भ्रष्टाचार के कालिया की लपेट में है
सभी कुछ इसकी चपेट में है।
मन्त्री से सन्तरी तक
तन्त्री से यन्त्री तक
फैला है इसका आकार
कभी साकार कभी निराकार।
भ्रष्टाचार का कालिया
डँस रहा है हमें हजारों हजार ढंगों से
रंग रहा है हमें अपने विकराल रंगों से।
निकल रहा है भंयकर फूत्कार
अपरिमित विषधार
हजारों हजार फनों से
लुभाता ही जा रहा है हमें
नित नये प्रलोभनों से।
नयी पीढ़ी दुग्ध-पान के साथ-साथ
इस कालिया के विष का
पान कर रही है,
अपनी अनैतिक उपलिब्धियों पर
अभिमान से भर रही है।
दानवता अट्टहास कर रही है,
मानवता डर रही है,
बौद्धिकता भावुकता को चर रही है,
संवेदना मर रही है।
बाट जोह रहें हैं हम सब ग्वाल-बाल
धरती से जुडे धरती के लाल
अपने कृष्ण कन्हैया की
नाग नथैया की;
किन्तु आज का कन्हैया
पौराणिक कन्हैया से भिन्न है
उसकी नीति की डाल
नैतिकता के मूल से छिन्न है।
वह सत्ता के कदम्ब पर चढ़कर
चैन की वंशी बजाता है,
अपने वादों की मोहक मुस्कान से
जन-मन को रिझता है,
हमारे हिस्से का माखन
खा-खाकार बल पाता है,
हमें कालिया के प्रभाव से मुक्त करने का
सुखद स्वप्न दिखाता है,
और नाग नाथने का आश्वासन देकर
कालिया से मिलने जाता है।
हम उसे आवश्यकता पड़ने पर
सहारा देते हैं,
और कालिया के फन पर चढ़ा देते हैं।
चढ़ जाता है,
तो अनायास ही उसका भाव
बढ़ जाता है।
फन पर चढ़कर वह मौन रह जाता है,
उसके आदर्शों का दुर्ग ढह जाता है,
वह स्वयं विष-लहर में बह जाता है।
कालिया से मिलकर
न जाने कौन सा मूक
समझौता कर लेता है,
कि कालिया को खुली छूट दे देता है
हमें छल लेता है।
कालिया की जकड़ बढ़ती
ही जा रही है।
कन्हैया के साथ उसकी मैत्री
रंग ला रही है।।
हे कालिया के भोले भाले ग्वालो !
उठो और अपनी चेतना संभालो
निराशा की रात्रि में दीप बन जागो
इस युग के केशव से जीवन
के अमृत की भीख मत माँगो।
देशभक्ति, कर्तव्य और सहयोग
को साथ लो,
द्वापर के कृष्ण की नीतियों पर चलकर
कलियुग के कालिया को नाथ लो।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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Saturday, March 11, 2006

चित्र गैलरी

चित्र गैलरी
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कुछ कविताएँ

कुछ कविताएँ

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चण्डी चरित्र


चण्डी चरित्र
(प्रबंध-काव्य)
संस्करण- प्रथम 1996
मूल्य- 60 रुपए मात्र
प्रकाशक -
संगीता प्रकाशन
57मोहतिशम खां
पीलीभीत (उ.प्र.) 262001
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