Friday, April 28, 2006

कालिया

दादी और नानी से सुना है
पुस्तकों में पढ़ा है
और चित्रों में बार-बार देखा है
कि द्वापर में
एक नाग था
विकट विकराल भीमकाय
त्रस्त था उसके त्रास से जीवन-समुदाय।
एक सहस्त्र फन थे उसके
काँपते थे लोग नाम से जिसके;
कालिया नाम था,
यमुना का श्यामल शीतल-जल धाम था।
अचूक था उसके विष का प्रभाव
सम्पर्क में आते ही प्राणों का अभाव।
कितना समदर्शी था वह !
गोपी-ग्वाल-बाल-धेनु
जो भी सम्पर्क में आता
जीवित बचकर न जा पाता ।
आज के युग में भी कालिया विद्यमान है।
तभी तो हरा-भरा उपवन वीरान है।
युग के अनुरूप
बदल गया है उसका स्वरूप
तब था सर्प की देह में,
अब है मनुज रूप में, प्रत्येक गेह में।
समाज की यमुना
भ्रष्टाचार के कालिया की लपेट में है
सभी कुछ इसकी चपेट में है।
मन्त्री से सन्तरी तक
तन्त्री से यन्त्री तक
फैला है इसका आकार
कभी साकार कभी निराकार।
भ्रष्टाचार का कालिया
डँस रहा है हमें हजारों हजार ढंगों से
रंग रहा है हमें अपने विकराल रंगों से।
निकल रहा है भंयकर फूत्कार
अपरिमित विषधार
हजारों हजार फनों से
लुभाता ही जा रहा है हमें
नित नये प्रलोभनों से।
नयी पीढ़ी दुग्ध-पान के साथ-साथ
इस कालिया के विष का
पान कर रही है,
अपनी अनैतिक उपलिब्धियों पर
अभिमान से भर रही है।
दानवता अट्टहास कर रही है,
मानवता डर रही है,
बौद्धिकता भावुकता को चर रही है,
संवेदना मर रही है।
बाट जोह रहें हैं हम सब ग्वाल-बाल
धरती से जुडे धरती के लाल
अपने कृष्ण कन्हैया की
नाग नथैया की;
किन्तु आज का कन्हैया
पौराणिक कन्हैया से भिन्न है
उसकी नीति की डाल
नैतिकता के मूल से छिन्न है।
वह सत्ता के कदम्ब पर चढ़कर
चैन की वंशी बजाता है,
अपने वादों की मोहक मुस्कान से
जन-मन को रिझता है,
हमारे हिस्से का माखन
खा-खाकार बल पाता है,
हमें कालिया के प्रभाव से मुक्त करने का
सुखद स्वप्न दिखाता है,
और नाग नाथने का आश्वासन देकर
कालिया से मिलने जाता है।
हम उसे आवश्यकता पड़ने पर
सहारा देते हैं,
और कालिया के फन पर चढ़ा देते हैं।
चढ़ जाता है,
तो अनायास ही उसका भाव
बढ़ जाता है।
फन पर चढ़कर वह मौन रह जाता है,
उसके आदर्शों का दुर्ग ढह जाता है,
वह स्वयं विष-लहर में बह जाता है।
कालिया से मिलकर
न जाने कौन सा मूक
समझौता कर लेता है,
कि कालिया को खुली छूट दे देता है
हमें छल लेता है।
कालिया की जकड़ बढ़ती
ही जा रही है।
कन्हैया के साथ उसकी मैत्री
रंग ला रही है।।
हे कालिया के भोले भाले ग्वालो !
उठो और अपनी चेतना संभालो
निराशा की रात्रि में दीप बन जागो
इस युग के केशव से जीवन
के अमृत की भीख मत माँगो।
देशभक्ति, कर्तव्य और सहयोग
को साथ लो,
द्वापर के कृष्ण की नीतियों पर चलकर
कलियुग के कालिया को नाथ लो।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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