Friday, April 28, 2006

स्वप्न

एक निशा की नीरवता में
जब जगती सारी सोती थी।
नभ-मण्डल पर चुपके-चुपके
तारों की मीटिंग होती थी।।
मैं भी अपनी छत पर सुख से
कोमल शैय्या पर सोया था।
वाह्य जगत से बेसुध होकर
स्वर्णिम सपनों में खोया था।
मैंने देखा मैं वन-पथ पर
धीरे-धीरे टहल रहा हूँ।
वन-जीवन के परिवर्तन को
घूम-घूम कर निरख रहा हँ।
उस जंगल के सभी निवासी
बदले-बदले से दिखते थे।
उनके रँग-ढँग कामकाज भी
बडे अनोखे से लगते थे।।
मैंने देखा-छोटा कीड़ा
निर्भय होकर घूम रहा था।
और उछलता मेढ़क उसको
बडे प्यार से देख रहा था।
कुछ आगे बढ़कर देखा तो
मोर सर्प से खेल रहा था।
सर्प कुण्डली मारे बैठा
नाच मोर का देख रहा था।।
एक भेड़िये ने फिर आकर
बकरे को माला पहनायी।
उसको सिर पर हाथ फेरकर
`निर्भय हो' आशीष सुनायी।।
वृद्ध बैल की झील किनारे
एक सिंह से भेंट जे गयी।
सिंह देखकर बेचारे की
सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी।।
किन्तु आज मृगराज बडे ही
बदले-बदले से दिखते थे।
नख कटवाये, दाँत छिपाये
भोले बकरे से लगते थे।।
आगे बढ़कर मृगअधिपति ने
वृद्ध बैल को शीश नवाया।
बडे प्रेम से हाथ पकड़कर
उसकी कुटिया तक पहूँचाया।।
बिल्ली के घर पर पशुओं के
प्रीति-भोज का आयोजन था।
उस दावत में खास तौर पर
चूहों-चिड़ियों का न्यौता था।।
बडे चाव से बिल्ली मौसी
सबको भोजन करा रही थी।
सदा झपटने वाली जालिम
खीर पूड़ियाँ परस रही थी।।
चमत्कार पर चमत्कार का
दर्शन कर मैं बड़ा चकित था।
हिंसक पशुओं में कस्र्णा का
बेग बड़ा आश्चर्यजनक था।।
मैंने सोचा पता लगाऊँ
आखिर ये परिवर्तन क्यों है?
जंगल के जालिम पशुओं में
आज दया का नाटक क्यों है?
एक लोमड़ी ने धीमे से
डरते-डरते मुझे बताया
बदले मौसम की यह माया
अब चुनाव का मौसम आया।
ये सारे ताकतवर हिंसक
अब चुनाव लड़ने वाले हैं।
बाहर से बदले-बदले हैं
अन्दर से पहले वाले हें।।

-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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