कैसे मान लूँ मैं
जिन्दगी मोहताज हो जब
मौत के रहमो करम की,
मिल गयी स्वातन्ञ्य की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
पाँव में जब बेड़ियाँ अज्ञान की हों
और भय की रस्सियों से कर बँधे हों;
मस्तकों में हो अँधेरे रूढ़ियों के
तथा ऋण के बोझ से कन्धे दबे हो;
डिगरियाँ लेकर सड़क पर
भटकती हो जब जवानी;
हो उदर में भूख, उर में हूक,
पीड़ा की कहानी;
निबल-कन्धों पर धरे अरमान के शव,
श्लथ-गति से बढ़ रही
असहाय सी, शमशान-पथ पर
नित निरन्तर भीड़ जो,
उस भीड़ को, उद्घोष सुन,
बारात कैसे मान लूँ मैं?
बुद्धिजीवी वर्ग जब निश्चेत हो
और चिन्तन रोग-शैय्या पर पड़ा हो;
बाड़ खेती को जहाँ पर खा रही हो,
वैद्य रोगी को जहाँ विष दे रहा हो;
न्याय देवी के नयन-द्वय
कृष्ण वर्णी पट्टिका से हो बँधे;
और सिक्कों की खनक में
हो सभी पण्डे सधे;
कट सकेंगे पाप के तब हाथ
कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्र्य की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
जब सुधा प्रहरी सुधाकर
सोम का कलशा चुराकर
पश्चिमी क्षिति ओर उन्मुख भागता हो;
किन्तु स्वास्थ के सघन
काले कुहासे की तहों में
रश्मियों का पुञ्ज दिनकर लापता हो;
वायु बन्दी बन गयी हो
जब कुबेरों के भवन में
और घुटती श्वाँस का स्वर हाँफता हो;
शुष्क सिकता पर चटखती
धूप में तब,
खिल सकेगा गात का जलजात
कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्रय की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
बेधते हो व्याघ-शर जब बुलबुलों को,
बेतहाशा चूस लें भौरे गुलों को;
जब चटखती शोख कलियाँ
खिल न पायें,
और श्यामल पात तृण पर
हिल न पायें;
जब पवन के पंख सौरभ हीन होवें,
जब पिकों के कंठ पर ताले जड़े हो,
तुम कहो, कहते रहो
`आया बसन्त'
किन्तु पतझर की बहकती बात
पीले पात लखकर
आ गया रितुनाथ कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्र्य की
सौगात कैसे मान लूँ मैं?
तप रहा जब व्योम में मार्तण्ड हो
ताप उसका प्रबल-प्रखर-प्रचण्ड हो;
और किरणों के दहकते वाण जब
बेधते हों नित निरन्तर उर धरा का;
सलिल वाही स्रोत सारे सूखते हों।
सूखता हो हरित आँचल उर्वरा का
चटखता हो जब हृदय
विश्वम्भरा का;
तब गगन के शुष्क-नीरस बादलों को देख
आ गयी बरसात कैसे मान लूँ मैं?
मिल गयी स्वातन्त्र्य की
सौगत कैसे मान लूँ मैं?
-डॉ.कृष्ण गोपाल मिश्र
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