Friday, April 28, 2006

ओ भरत भद्र

अब काँप रहे हैं धरा-व्योम-रवि-शशि-तारे
झंझा में कँपती दीप शिखा सी मानवता।
क्षण-क्षण शोषण के रावण करते अट्टहास
स्वारथ-रथ पर चढ़ दिशि-दिशि फिरती दानवता।।
सत्ता का लालच रचता नित षड़यंत्र नये
मंथरा कुटिलता नयी-नयी चालें चलती।
मोहान्ध स्वार्थपरता कैकयी-सी छलना
दशरथ से सत को यन्त्र-तत्र छलती फिरती।।
सद्नीति कौशिला सी रोती है फूट-फूट
सद्क्रिया सुमित्रा खड़ी हुई निस्र्पाय आज।
गुस्र्वार वशिष्ठ से प्रज्ञाजीवी मौन खड़े
हो दिशाहीन असहाय रो रहा जन-समज।।
पद के अनुरूप योग्यताधारी प्रतिभायें
पा रहीं निरन्तर हैं शासन से निर्वासन।
वनवास भोगते आदर्शों के राम आज
है कर्मवीर लक्ष्मण बिनु सूना राजभवन।।
सद्भावों के मंजुल मयंक! ओ भरत भद्र!
संत्रस्त आयोध्या बाट तुम्हारी जोह रही।
ओ भ्रातृभक्ति-प्रतिमूर्ति ! तपी ! ज्ञानी ! उदार !
शोषित-पीड़ित मानवता तुमको टेर रही।।
आओ! आकर बदलो युग के रथ की गति को
शोकुकाल विह्बल जन-मन को फिर धीरज दो।
लालच की अंधी गलियों में भटके युग को
वैराग्य-दीप-आलोक दिखा निर्देशन दो।।
वैधव्य भोगतीं जिसके कारण मातायें
जिस कारण सीता सुकुमारी फिरती वन-वन।
उस पिशाचिनी सत्ता की लिप्सा ज्वाला का
है धर्मवीर! नन्दी कानन में करो शमन।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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