तीन कविताएँ
प्रश्न चिन्हों की कतारों सी समस्याएँ खड़ी।
कह रही हैं-आज तक क्या हम सभी करते रहे।।
भूख-बीमारी-गरीबी देश में बढ़ती रही।
स्वार्थ प्रेरित जलद बन हम सिन्धु पर झरते रहे।।
स्वार्थ-सर्पिणि देश की खुशहालियाँ डसती रही।
हम कुशलतम संपेरे का ढोंग भर भरते रहे।।
धर्म-भाषा-क्षेत्र की नित खाइयाँ बढ़ती गयीं।
पाटने से किन्तु सत्ता मोह में बचते रहे।।
प्रश्नपत्रों सी समस्यायें विरासत में मिलीं।
हम परीक्षाकाल में बस हाँशिये रँगते रहे।।
पुल बने, चिमनी बनीं, सड़कें बनीं पर साथ ही।
हम विदेशी कर्ज की चक्की तले दलते रहे।।
सदा सीमायें हमारी शत्रुदल छलना रहा।
हम कबूतर शान्ति के बन विश्व में उड़ते रहे।।
प्रगति होती राष्ट्र की क्या खाक, जब सब रहनुमा।
चुनावों की परिधि पर ही चक्रवत चलते रहे।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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हिन्दी बाहर लाओ
गूँज रही है धरा-गगन में
जिसकी गौरव-गाथा।
कोटि-कोटि कंठों का कलरव
जिसकी महिमा गाता।।
लहर-लहर लहाराये नभ में
जिसकी सुयश पताका।
युग-युग से विद्वद-जन जिसके
पग पग पर शीश झुकाता।।
वह जननी, यह लोक-भारती
शारद की प्रतिमा-सी।
लोक-वंदिता भारत माँ के
यश की शुभ गरिमा-सी।।
वह हिन्दी वह राष्ट्रवाणी
निखिल विश्व में गूँजे।
जग उपवन में प्रवास की
काली-कोकिल सी कूजे।।
आजादी के महासमर का
शंख बजाने वाली।
स्वतन्त्रता की स्वाभिमान की
ज्योति जलाने वाली।।
भारत की सब भाषाओं का
सिंचन करने वाली।
हिन्दी है भारतमाता के
मुख-मण्डल की लाली।।
अगणित लेखक-कवि-सम्पादक
इसने जग में जाये।
युग-युग से इसकी पूजा में
हमने दीप जलाये।।
वह हिन्दी वह मातृभाषा
विश्व गगन में चमके।
उसके सुरभित सुमनों से
अग-जग का आँगन महके।
उसके सुरभित सुमनों से
अग-जग का आँगन महके।।
देशभक्ति का राष्ट्र-प्रेम का
दावा करने वालों !
अंग्रेजी के पक्षपात की
हमी भरने वालों !
औरों की माता के ऊपर
अपनी माँ मत वारो।
तन-मन-धन-जन करो समर्पित
माँ का मुकुट सँवारो।।
स्वार्थ-सिद्धि के गलियारों से
हिन्दी बाहर लाओ।
भारत-माँ के उच्च भाल की
बिन्दी को चमकाओ।।
अंग्रेजी के पक्षपात का
दूषित चिन्तन छोड़ो।
हिन्दी की पावन यश-धारा
प्रगति-पंथ पर मोड़ो।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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आज आने दो नयी कोंपल वहाँ
जरा-जर्जर अस्थि-पञ्जर-गात!
ऐ पके पीले पुराने पात!
पेड़ की इस शाख पर
कब तक रहोगे?
लोभ-लिप्सा की उफनती बाढ़ में
कब तक बहोगे?
मृदा का शोषण बहुत
तुम कर चुके हो!
रक्त मधु ऋतु का बहुत
तुम पी चुके हो!
हो चुका फिर भी तुम्हारी
शक्ति का अवसान;
जोहता है अब तुम्हारी
बाट ये शमशान।
अत: कर दो रिक्त वह स्थान
मोहवश जिसको लिया है
निजी सम्प्रति मान।
लोभ का अब और मत
पोषण करो;
किसलयों का अब न यों
शौषण करो;
कुण्डली सी काढ़ तुम
बैठ जहाँ,
आज आने दो नयी
कोंपल वहाँ।।
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
-०००-
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