Friday, April 28, 2006

नर प्रवीर सुभाष

प्रबल पौस्र्ष पुंज केहरि !
धीर ! वीर ! सुभाष !
ओ हिमालय के शिखर सम
सुदृढ़ उन्नत भाल !
ओ धरा की धीरता से
भारती के लाल !
दासता हेमन्त -ऋतु के
शुभ सुखद-दिनमान !
पद-दलित परतंत्र-भारत
राष्ट्र के अभिमान !
चेतना की ज्योति के
आलोक-प्रद शुभ-हास।।
देश के गौरव हमारे
सुयश के शुभ-केतु,
दलित जन के उन्नयन हित
क्रांति के शिव-केतु;
राष्ट्र के गौरव तुम्हारा
मुक्ति का अभियान,
है करोड़ों भारतीयों के
सिरों का मान;
थी तुम्हारे कर्मपथ में
छिपी सुख अभिलाष ।।
सिंह सा गर्जन तुम्हारा
दासता तम चीर,
रहा करता दीर्घयुग तक
शुत्र हृदय अधीर;
थी बसी उर में तुम्हारे
देश जन की पीर;
`काट डालूँ दास्य-बंधन
तोड़ दूँ जंजीर'
था यही संकल्प केवल
थी यही शुभ-आशा ।।
नीति मेरी ही सही है
यह दुराग्रह ठान,
ध्वस्त होते देख अपने
अहं का अभिमान;
किया जब सहकमिर्यों ने
उपस्थित गतिरोध,
तब बढ़े नूतन-दिशा में
क्रांति का पथ शोध;
रोक कब पाया प्रभंजन
गति सघन आकाश ?
हैं नियंता की नियति के
अति निराले खेल;
देशभक्तों ने किया फिर
देश-रिपु से मेल;
सत्प्रयासों पर तुम्हारे
दिया पानी फेर
विजय का शुभ चंद्र डाला
राहु ने फिर घेर
हाय् ! हत-आहत हुये तुम
पुज न पायी आश !
धीर ! वीर ! सुभाष !!
-डॉ॰ कृष्णगोपाल मिश्र
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